12 माह में करोड़ों रुपये की बिक गईं दवाएं, अंत में संतुलित आहार-सकारात्मकता ही काम आई

0

कोरोना के चिकित्सकीय प्रोटोकॉल में बड़े बदलाव होने पर डॉक्टर, वैज्ञानिक और शोद्यार्थी काफी आश्चर्यचकित हैं। इनका कहना है कि आज भारत के नए प्रोटोकॉल को देख साक्ष्य आधारित चिकित्सा के पितामह डेविड सैकेट काफी प्रसन्न होंगे। महीनों पहले ही इन दवाओं को विज्ञान जगत ने बेअसर बताया लेकिन फिर भी भारत सरकार के प्रोटोकॉल में ये दवाएं शामिल रहीं।

इसका परिणाम यह था कि 12 महीने में करोड़ों रुपये की दवाएं बाजारों में बिक गईं। वहीं करोड़ों रुपये की कालाबाजारी से दवा कंपनियों को कमाई भी हो गई। विशेषज्ञों का कहना है कि साल भर में करोड़ों रुपये की कालाबाजारी, दवा कंपनियों को मुनाफा और भारत सरकार की समितियों में बैठे प्रतिनिधियों के बेतुके फैसले लेने के बाद अंत में संतुलित आहार और सकारात्मकता पर ही आकर देश खड़ा हो गया।

अमर उजाला ने इन दवाओं को लेकर सबसे पहले 16 सितंबर 2020 को खुलासा किया था कि बगैर जांच-परख लोग करोड़ों रुपये की दवाओं का सेवन कर चुके हैं लेकिन इन दवाओं का कोई साक्ष्य विज्ञान को नहीं मिला है। तब से लेकर अब तक छह बार रार्ष्टीय कोविड उपचार प्रोटोकॉल की अहम खामियों के बारे में जानकारी दी। इन पर संज्ञान लेते हुए सरकार ने एडीआर रिपोर्टिंग के लिए 18001803024 हेल्पलाइन नंबर तक जारी किया, लेकिन प्रोटोकॉल से बगैर साक्ष्य वाली दवाओं को नहीं हटाया गया।

अचानक से साक्ष्य आधारित चिकिस्ता प्रोटोकॉल
महाराष्ट्र के सेवाग्राम स्थित कस्तूरबा गांधी अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. एसपी कालांत्री का कहना है कि पहले तो उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ कि अचानक से साक्ष्य आधारित चिकित्सा प्रोटोकॉल कहां से आ गया? उन्होंने कहा कि भारत सरकार के इस प्रोटोकॉल को देख साक्ष्य आधारित चिकित्सा के जनक डेविड सैकेट बहुत खुश होंगे। कोरोनिल और 2 डीजी जैसी दवाओं का सरकार ने खूब प्रमोशन किया लेकिन अब इनका जिक्र तक नहीं है। उन्होंने कहा कि अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी एचसीक्यू दवा का सेवन किया और तब भारत में इसे एक बड़ी उपलब्धि बताया जा रहा था। इससे अधिक और क्या मजाक हो सकता है?

टास्क फोर्स और अन्य समितियों में बैठे प्रतिनिधियों पर संदेह
वहीं आईएमए के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. राजीव जयदेवन का कहना है कि कई बार टास्क फोर्स और अन्य समितियों में बैठे प्रतिनिधियों पर संदेह होता है। नए प्रोटोकॉल बेहतर हैं लेकिन आईसीएमआर और एम्स के पुराने प्रोटोकॉल का क्या है? इस पर कोई जानकारी है। दोनों ही अलग-अलग हैं। एक प्रोटोकॉल बनता है और पूरे देश में महीने भर में करोड़ों रुपये की दवा बिक जाती है। फिर पता चलता है कि उसका तो कोई असर ही नहीं है। यानी पूरी तरह से मजाक बना हुआ है।

नीति आयोग के सदस्य डॉ. वीके पॉल, आईसीएमआर के महानिदेशक डॉ. बलराम भार्गव, एम्स के निदेशक डॉ. रणदीप गुलेरिया, आईसीएमआर के पूर्व संक्रामक रोग प्रमुख डॉ. रमन आर गंगाखेड़कर, वर्तमान प्रमुख डॉ. समीरन पांडा, स्वास्थ्य मंत्रालय के संयुक्त सचिव लव कुमार अग्रवाल सहित इन सभी के अनुसार देश में 80 फीसदी मरीज बिना या हल्के लक्षण वाले हैं। इसका मतलब साफ है कि 80 मरीजों को दवा नहीं लेनी है।

अब क्षेत्रीय भाषा में होना चाहिए प्रोटोकॉल
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की मुख्य वैज्ञानिक डॉ. सौम्या स्वामीनाथन ने सोशल मीडिया पर नए चिकित्सीय प्रोटोकॉल को बेहतर बताते हुए कहा कि यह काफी सरल और आसान भाषा में है। इसे सरकारों को क्षेत्रीय भाषा में भी प्रकाशित करना चाहिए ताकि अच्छे से संदेश पहुंच सके।

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *